
पाकिस्तान की सेना सिर्फ एक सैन्य ताकत नहीं, बल्कि देश की सबसे बड़ी कारोबारी संस्था बन चुकी है। जितना उसका प्रभाव सीमा पर है, उतना ही असर वो देश की आर्थिक धमनियों पर भी रखती है। “मिलिट्री + बिज़नेस = मिलिट्रोनॉमी”, यह शब्द आज पाकिस्तान में सेना की हकीकत को बखूबी बयां करता है।
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कारोबार के हर कोने में सेना
तेल, गैस, सीमेंट, रियल एस्टेट, कृषि, सिक्योरिटी, शॉपिंग मॉल, खाद-कारखाने – ऐसा कोई क्षेत्र नहीं बचा जहां पाकिस्तानी सेना का सीधा दखल न हो।
सेना के तहत 50 से अधिक कंपनियां चल रही हैं। इनमें शामिल हैं:
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फौजी फाउंडेशन
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बहरिया फाउंडेशन
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शाहीन फाउंडेशन
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डिफेंस हाउसिंग अथॉरिटी (DHA)
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आर्मी वेलफेयर ट्रस्ट (AWT)

खेती भी फौज के नाम
2023 में शुरू हुआ ग्रीन पाकिस्तान इनिशिएटिव (GPI), सेना के कॉर्पोरेट फार्मिंग प्रोजेक्ट का हिस्सा है। इसके तहत लाखों एकड़ बंजर जमीन को खेती लायक बनाया जा रहा है – लेकिन ये जमीन सेना की The Green Corporate Initiative (GCI) नाम की कंपनी को दी गई है, वो भी 30 साल की लीज पर।
40 अरब डॉलर का साम्राज्य
नेशनल असेंबली में पेश एक रिपोर्ट के अनुसार, सेना के व्यापारिक साम्राज्य की कीमत 40 अरब डॉलर से भी ज़्यादा आंकी गई है। यह आंकड़ा सेना को देश की सबसे बड़ी बिज़नेस इकाई बनाता है – किसी आम कारोबारी घराने से कहीं अधिक ताक़तवर।
बाजवा लीक और अरबों की कमाई
2022 में आई BajwaLeaks रिपोर्ट ने पाकिस्तानी सेना की धनसंपत्ति का एक काला पक्ष उजागर किया। बताया गया कि तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल क़मर जावेद बाजवा के कार्यकाल में उनके परिवार ने 13 अरब डॉलर की संपत्ति बना ली – फार्महाउस, विदेशों में प्रॉपर्टी, इंटरनेशनल बिज़नेस – सबकुछ सेना की वर्दी की आड़ में।
सेना बनाम जनता
पाकिस्तानी जनता अब इस सच को पहचान चुकी है। सेना को एक रक्षक नहीं, बल्कि “साहूकार” और “कॉर्पोरेट शार्क” के रूप में देखा जाने लगा है। ग्रीन इनिशिएटिव से सिंध और बलूचिस्तान जैसे इलाकों में विरोध भड़क चुका है। खेती के नाम पर जल संसाधनों की लूट और गरीब किसानों की ज़मीनें छीनने के आरोप आम हो गए हैं।
पाकिस्तान की सेना अब सिर्फ बंदूक नहीं चलाती, वो प्रॉफिट भी गिनती है। व्यापारिक साम्राज्य ने उसे एक ऐसी ताकत बना दिया है जो संसद, जनता और कानून से ऊपर है। जब सेना ही सबसे बड़ा व्यापारी बन जाए, तो लोकतंत्र और जनता का दम घुटना तय है।
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